राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) की टीम ने बुधवार को आगरा के मानसिक स्वास्थ्य संस्थान की व्यवस्थाएं परखीं। इस दौरान आयोग के चेयरमैन जस्टिस अरुण मिश्रा ने संस्थान की अव्यवस्थाओं पर कहा कि बहुत शर्मनाक स्थिति है। बिस्तरों से बदबू आ रही है, शौचालय गंदे पड़े हैं। मनोरोगियों के भी मानवाधिकार हैं, जो उन्हें नहीं मिल रहे। एक तो वह समाज से पीड़ित हैं, दूसरी तरफ अस्पताल में ये हालात हैं।
बुधवार शाम को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की टीम चेयरमैन जस्टिस अरुण मिश्रा व जस्टिस महेश मित्तल टीम के साथ मानसिक स्वास्थ्य संस्थान पहुंची थी। यहां बैठक में उन्होंने व्यवस्थाओं पर सवाल किए। चेयरमैन ने पूछा, बताओ क्या-क्या कमियां हैं। संस्थान निदेशक ज्ञानेंद्र कुमार ने बताया कि सब ठीक है। चेयरमैन बोले, सब ठीक है तो फिर जिला जज ने रिपोर्ट में कमियां क्यों बताई हैं। तो निदेशक बोले-जिला जज के निरीक्षण के बाद तीन महीने में सुधार हो गया है।
मनोरोगियों को कैसा खाना मिलता है ?
कमिश्नर अमित गुप्ता ने बताया कि पिछली बैठक के बाद साफ-सफाई, खान-पान में बदलाव आया है। निदेशक ने बताया कि 250 से 260 मरीज आते हैं। दिन के हिसाब से ड्यूटी रोस्टर बना है। दो से तीन चिकित्सक, जेआर व एसआर मरीज देखते हैं। चेयरमैन ने खाने के बारे में पूछा और कहा कि क्या मनोरोगियों को ऐसा खाना मिलता है जिसे हम सब खा सकें, तो निदेशक ने कहा, हां सर सभी लोग खा सकते हैं।
प्रशासनिक भवन में करीब 40 मिनट चर्चा के बाद टीम ने मेल वार्ड, फीमेल वार्ड और फैमिली वार्ड देखा। भर्ती महिला मरीजों से फीडबैक लिया। इसके बाद टीम केंद्रीय कारागार पहुंची जहां जमानत के बाद भी एक बंदी रिहाई न होने पर नाराजगी जताई। इस दौरान टीम में एनएचआरसी के मुख्य सचिव देवेंद्र कुमार, संयुक्त सचिव एचसी चौधरी, आकांक्षा एवं शिल्पी जैन, राजीव जैन, एसएसपी प्रभाकर चौधरी आदि मौजूद रहे।
छह करोड़ रुपये हो गए लैप्स
मानसिक अस्पताल का सालाना बजट 19.75 करोड़ रुपये है। पिछले साल 12 करोड़ रुपये मिले। जिसमें छह करोड़ रुपये खर्च नहीं होने के कारण लैप्स हो गए। चेयरमैन ने पूछा, बजट का रोना रोते हो तो बजट लैप्स कैसे हो गया। कमिश्नर अमित गुप्ता ने बताया कि बजट 30 मार्च को मिला था, इसलिए खर्च नहीं हो सका। निकालने से पहले ही लैप्स हो गया।
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राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) की टीम ने बुधवार को आगरा के मानसिक स्वास्थ्य संस्थान की व्यवस्थाएं परखीं। इस दौरान आयोग के चेयरमैन जस्टिस अरुण मिश्रा ने संस्थान की अव्यवस्थाओं पर कहा कि बहुत शर्मनाक स्थिति है। बिस्तरों से बदबू आ रही है, शौचालय गंदे पड़े हैं। मनोरोगियों के भी मानवाधिकार हैं, जो उन्हें नहीं मिल रहे। एक तो वह समाज से पीड़ित हैं, दूसरी तरफ अस्पताल में ये हालात हैं।
बुधवार शाम को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की टीम चेयरमैन जस्टिस अरुण मिश्रा व जस्टिस महेश मित्तल टीम के साथ मानसिक स्वास्थ्य संस्थान पहुंची थी। यहां बैठक में उन्होंने व्यवस्थाओं पर सवाल किए। चेयरमैन ने पूछा, बताओ क्या-क्या कमियां हैं। संस्थान निदेशक ज्ञानेंद्र कुमार ने बताया कि सब ठीक है। चेयरमैन बोले, सब ठीक है तो फिर जिला जज ने रिपोर्ट में कमियां क्यों बताई हैं। तो निदेशक बोले-जिला जज के निरीक्षण के बाद तीन महीने में सुधार हो गया है।
मनोरोगियों को कैसा खाना मिलता है ?
कमिश्नर अमित गुप्ता ने बताया कि पिछली बैठक के बाद साफ-सफाई, खान-पान में बदलाव आया है। निदेशक ने बताया कि 250 से 260 मरीज आते हैं। दिन के हिसाब से ड्यूटी रोस्टर बना है। दो से तीन चिकित्सक, जेआर व एसआर मरीज देखते हैं। चेयरमैन ने खाने के बारे में पूछा और कहा कि क्या मनोरोगियों को ऐसा खाना मिलता है जिसे हम सब खा सकें, तो निदेशक ने कहा, हां सर सभी लोग खा सकते हैं।
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